किस ओर तू चला है बावरे?


किस ओर तू चला है बावरे?
किस ओर तू उड़ा है बावरे?
हर दिशां में तेरी ही छवि है
और हर छवी में वोह हर शक़्स है ,जिसे तलाश हर वक़्त है
पुकारती है मंजिले जिसे बेहध है
किस ओर तू चला है बावरे?
किस ओर तू उड़ा है बावरे?
कतरा कतरा जीता क्यूं है?
फिर कतरा कतरा मरता क्यूं है?
बिखरे सवालो सा फिर क्यूं है?
उलझे जवाबों सा फिर क्यूं है?
जब खुद में है अस्तितिव तेरा
फिर हर जगह भटकता तू क्यू है?
किस ओर तू चला है बावरे ?
किस ओर तू उड़ा है बावरे?
“सुरवइवर पोईतिस”
एशिका

कुछ है


कुछ है

जो दबी है हवाओ में कही
जो सर उठाओ तो देख लेना

वही खूँटे पे तंगी लमहों की चादर मिलेगी
कुछ रंगो में एहसासों की नशीली परछाईं मिलेगी
मदहोशी में सनी आख़री साँसे लेता, वो बुदबुदाता बल्ब मिलेगा
अपनी ही परत उतारती, वो आँधियो में हिम्मत रखती दीवार मिलेगी
उस छत से टपकती बूँदों में छिपें फ़रियाद मिलेंगे
अपनी ख़ुश्क बदन को सम्भालता , वो टूटता अलमिराह का पल्ला मिलेगा
मेज़ पर रखी ash tray में सूखे ख़ाक के पत्ते मिलेंगे
पलंग की खोकली होती टांगो में दीमक लगे ढेर होते घर मिलेंगे
उस खिड़की की पकड़ में खनकती काँच की चूड़ियाँ मिलेंगी
बिस्तर के माथे पर कई रंगीन चिपकी एक टक देखती बिंदिया मिलेंगी
नासूर होती दर्द के सैलाब में डूबी वो वरांडा में डालिए के पौधे मिलेंगे

हो सके तो सहेज लेना इन्हें
समय की मार से निराश
सब नज़रें टिकाए अधखुली आँखो से
बेइन्तहा रोशनी के इंतेज़ार में हैं

कब धुँध छटेगी? कब उजाला होगा?

ख़ुद को समेट पाओ तो आ जाना
ख़ुद से लड़ पाओ तो आ जाना
ख़ुद को मिटा पाओ तो आ जाना l

Picture by Kelly Sikkema (Unsplash)

रिश्ते

कुछ रिश्ते कितने अजीब होते हैं,
दूर हो कर भी करीब होते हैं।
भोएं तंज कर लेना,और तुनक जाना,
खूब लड़ना और मिलते ही रो रो के गले लगाना।
कुछ रिश्ते ———


उधड़े हुए वाकयों को सुई से पिरोना,
पेबंद लगा कर संजों रखना,बेरंग कपड़ों की तरह,
खुशबू से उनकी फिर ,ताज़ा वो वाकये होते हैं।
कुछ रिश्ते——-


है रंजिशे जो झुर्रियों की तरह आ ही जाती हैं,
उम्र हो चली तो इन रंजिशो को झुर्रियों की तरह छुपाना,
धो कर आइने में फिर उन्हें निहारना,
फिर याद कर गुजरे वक़्त को कहना,
हट झुर्रियों से भी कोई बूढ़े होते है।
कुछ रिश्ते——

Photo by Everton Vila on Unsplash

शिक्षा का व्यापार

गाँव-गाँव तक फैल गया है शिक्षा का प्रसार

लेकिन शिक्षा  बन बैठी है अब एक कारोबार

बच्चों के स्कूलों से ही तय होता है

अब  परिवार का सामाजिक आधार।

पाँच सितारा होटेलों के जैसे

स्कूल की इमारतें की जाती हैं तैयार,

सरकारी सहायता के एवज में

लाभ कमाने के अवसर होते साकार ।

इंटरनेशनल स्कूल का  लेबल लगाकर

हल्का करते लोगों की जेबों का भार,

कर नहीं पाते फिर भी बच्चों को

स्वावलंबी ज़िंदगी जीने के लिये तैयार।

इंगलिश मीडियम के चक्कर में

कई घर कर बैठे अपना बंटाधार ।

आधुनिक बनाएँ पर संस्कार ना भुलाएँ

महत्त्वाकांक्षी माता-पिता फँसे बीच मझदार।

उद्योगपति, नेता और व्यापारी

बन बैठे हैं शिक्षा के ठेकेदार,

लक्ष्मी जी के पुजारी चला रहे हैं

सरस्वती जी के ज्ञान मंदिर-द्वार।

होती जा रही है तेज़ी से सब ओर

नये शिक्षा-संस्थानों की भरमार,

फिर भी क्यों गिरता जा रहा है

बुनियादी शिक्षा का आधार ।

आओ सादगी से मनाएँ हम शिक्षा का त्योहार,

ज्ञानोपार्जन ही उद्देश्य हो विद्यालयों का

शिक्षा वितरण का ना हो व्यापार ।

सुख सुविधाओं से शिक्षा को तोलकर

ऐय्याशी की ना करो पुकार

शारीरिक और मानसिक योग्यता बढ़ाकर

उज्ज्वल भविष्य बच्चों का करो तैयार ।

विद्या के मंदिर को ना बनाओ,

हानि-लाभ से जुड़ा कारोबार।

विद्यादान एक सेवा है,  न बनाओ इसे व्यवसाय

चलो शिक्षा के क्षेत्र में शुरु करें नया अध्याय।

Picture by Aaron Burden (Unsplash)

खुद को भी तो वक्त दो

खुद को भी थोड़ा वक्त दो :- आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में इंसान इतना व्यस्त हो गया है कि वह अपने घर -परिवार, स्वास्थ्य और स्वयं के लिए भी समय नहीं निकाल पाता है और पैसे की होड़ में जीवन की सच्ची खुशियों को भूलता जा रहा है । हम सभी को अपने लिए कुछ समय ज़रूर निकालना चाहिए क्योंकि  जान है तो जहान है !

करो परिश्रम चाहे कितनी

घर परिवार चलाने को,

खुद को भी थोड़ा वक्त दो

सेहत तंदुरुस्त बनाने को ।

करो कोशिशें चाहे कितनी

व्यापार समृद्ध बनाने को

खुद को भी थोड़ा वक्त देना

स्वास्थ्य अपना बचाने को।

पढ़ो जाग दिन-रात  चाहे जितना

परीक्षा में अव्वल पोज़ीशन लाने को

थोडा वक्त ज़रूर निकालना

दिमाग को तरो-ताज़ा बनाने को

करो विदेशी यात्राएँ चाहे कितनी

टारगेट पूरा करने को

थोड़ा वक्त खुद को भी दो

सेहत अपनी बचाने को।

कंप्यूटर के आगे बैठो चाहे कितना

प्रोजेक्ट रिपोर्टस बनाने को

थोड़ा वक्त खुद को भी दो

जवानी अपनी बचाने को।

पीज़ा,नूडल्स , बर्गर ,पैप्सी मंगाओ

पार्टी- जश्न मनाने  को

थोडा वक्त सेहत को भी देना, बीमारियों से खुद को बचाने को ।

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Picture by Aron Visuals (Unsplash)

मैं और मेरी शून्यता

जागने की हसरत थी रोशिनओं में
मुझे जगाए रखा अंधेरों की ठोकरों ने।

जो नहीं समझ पाते अंधेरों की जागृित
वो कैसे समझेंगे मेरा जागरण
वो कैसे समझेंगे मेरे अंधेरों के उजाले
वो सो रहे हैं आँखें खोल कर
अंधेरों से अंधेरा पैदा हो यह ज़रूरी नहीं
पर ये वो नहीं समझते
जो बौद्धिक अंधकार के शिकार हैं।

जो नहीं समझ पाते मौन प्रवृत्ति
वो कैसे समझेंगे मेरी खामोशी
वो कैसे समझेंगे मौन अंबर का दहक
वह कैसे समझेंगे मौन धरा का संयम
अब कौवा नहीं आता हमारी डेहरी पर
शायद वह भी ऊब चुका है हमारे कांव-कांव से
हमें पसंद है कांव-कांव प्रतियोगिता का विजेता बनना
और वह कौवा शायद कहीं छुप कर
हमारे इस पराजय का शोक मना रहा हैं।

लोग यहां अनिगन कोष्ठकों में सीमित
बुनते रहते हैं अपना समीकरण
शून्य के सत्य से बेखबर
जो उनकी कोष्ठकों के बाहर है घात लगाए
में खुश हूं कि इन संख्याओं से परे
जीता हूं अपने सत्य में अपनी शून्यता में
जो समझो मुझे सोया हुआ
तो मुझे जगाना मत।

Picture by Daniel Jenson (Unsplash)

मेरे पिता


This poem is about a son’s love for his father. It begins describing the father’s and goes on to show love the son has for his father. “His father is everything to him. He knows what his father did and how much he sacrificed for his son. In the end, it is clearly shown that “he reveres his father as God”.

किसी ने लिखा है,
सूखे पत्ते पेड़ो से
रिश्ता तोड़ जाते है
और बाप अपाहिज हो जाये
तो बेटे रिश्ता तोड़ जाते है…
मगर मेरी कुछ ऐसे राये है .
मुझे सुला कर छाओ मै
खुद जलते रहे धूप मै
मुझे बचा कर बारिश से
खुद जलते रहे अंगारो मै,
मैंने देखा है एक फ़रिश्ते को
आपने पिता के रूप मै…
मेरी आना, मेरी शान, मेरे अभिमान है मेरे पिता
पिता नहीं तो मै भी कुछ नहीं
क्युकी मेरी पहचान है मेरे पिता…
पिता है तो हर ख्वाब पुरे है
पिता नहीं तो कुछ भी नहीं,
पिता है तो बाजार के सारे खिलौना आपने hai..
पिता नहीं तो दो वक्त की रोटी भी नहीं…
पिता है तो बचपन सुहाना है
पिता नहीं तो सब कुछ अधूरा सा है,
पिता है तो नन्ही सी गुड़िया मै जान है
पिता नहीं तो माँ का स्वाघ भी नहीं.
मेरी आना, मेरी शान, मेरे अभिमान है मेरे पिता
पिता नहीं तो मै भी कुछ नहीं
क्युकी मेरी पहचान है मेरे पिता…
बचपन मै अपनी अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया.
मै गिरा मगर आपने मुझे उठना सिखाया..
आपने कंधे मै बैठा के
मेला मुझे घुमाया
मैंने माँगा एक खिलौना
आपने दस मुझे दिलाया..

आपके ही नाम से मेरा नाम है
आपकी पहचान से मेरा पहचाहन है…

मेरी आना, मेरी शान, मेरे अभिमान है मेरे पिता
पिता नहीं तो मै भी कुछ नहीं
क्युकी मेरी पहचान है मेरे पिता…
*मेरे लिए तो मेरे भगवान है मेरे पिता*

Picture by Nick Wilkes (Unsplash)

असफलता की नींव पर


असफलताओं के दौर में,

सफलता एक ख़ास मिली,
शायद कुछ और मेरे लिए है चुना,
कुदरत से ये आस मिली।

मुड कर जब मैं देखूंगा,
पहुंच कर उस ओर,
ये दौर याद कर हँस लूंगा,
क्योंकि हूंगा मैं किसी ओर छोर।

मेरी कामयाबी इसी असफलता की नींव पर खड़ी है,
असफलता ही तो यारों उन्नती की कड़ी है,
मैं गर न हार जाता तब ,
तो ये दिन कहां से आता,
तरक्की का यह हार शायद कोई ना पहनाता।

तो फिर गर गिर जाऊं ,
तो उठाना ना मुझे,
ना गले लगाना ,ना फुसलाना कभी,
मैं गिर के उठने वालों में से हूँ,
बहुत हिम्मत बाकी है मुझमें अभी।

मैं असफलता पर इमारत बनाना जानता हूँ,
गिर कर उठना और लड़खड़ा कर समहलना जानता हूँ।,
पल पल को जोड़ कर ,
खूबसूरत जिंदगी बनाना जानता हूँ।

Picture by David Kovalenko

सारी उमर कौन रोता है?


तुम जो चले गए दुख तो बहुत होता है,

जंदगी है यारों सारी उमर कौन रोता है,
चद्दर की सिलवटों में तुम्हारी याद रहेगी,
किसी जन्म में फिर मिलने की फरियाद रहेगी,

रातों में चांद शायद ताने दे,
हमको अपने वादे याद दिला दे,
करवटों की हलचल कहां गई,
सांसों की आवाज़ लुप्त हुई,
अब आराम से यहां कौन सोता है,
जिन्दगी है यारों सारी उमर कौन रोता है।

वह तुम्हारा माथे पर चूम लेना
और प्यार से बाहों में भर लेना,
अब कहां होता है,
जिंदगी है यारों सारी उमर कौन रोता है।

सासों में भारीपन है,
आंखों में नमी
खलति जरूर है तुम्हारी कमी
इस सब से भी क्या होता है?
जिंदगी है यारों सारी उमर कौन रोता है।

Picture by Cristian Newman (Unsplash)